भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की गणेश चतुर्थी को कलंक चतुर्थी कहा जाता है. कलंक चतुर्थी को चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए अन्यथा चोरी का झूठा कलंक लगता है. 2 सितंबर 2019 को है कलंक चतुर्थी. क्यों कहते हैं इसे कलंक चतुर्थी, कैसे बचें यदि अंजाने में हो जाए भूल.
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भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी जिसे गणेश चतुर्थी कहा जाता है. उस दिन चंद्रमा को बिल्कुल नहीं देखना चाहिए. चंद्रदर्शन से चोरी का झूठा कलंक लगता है. इसलिए इसे कलंक चतुर्थी भी कहते हैं. भगवान श्रीकृष्ण ने भी भूले से कलंक चतुर्थी को चंद्रमा के दर्शन कर लिए थे इस कारण उन पर भी लगा था आरोप. यदि भूले से भी हुए हों चंद्रदर्शन तो उसकी मुक्ति के उपाय कर लेने चाहिए. मुक्ति के बड़े सरल उपाय है. मुश्किल से 5 मिनट भी नहीं लगता.
इस पोस्ट में आप जानेंगे-
- भाद्रपद की गणेश चतुर्थी को कलंक चतुर्थी क्यों कहते हैं?
- कलंक चतुर्थी को चंद्रदर्शन क्यों नहीं करने चाहिए
- कलंक चतुर्थी को भूल से हो जाए चंद्रदर्शन तो क्या उपाय करना चाहिए
- भगवान श्रीकृष्ण को कलंक चतुर्थी के चंद्रदर्शन से क्या आरोप लगा था
- कलंक चतुर्थी की कथा
भगवान श्रीकृष्ण पर द्वारका में स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप लग गया. भगवान बड़ी दुविधा में थे कि आखिर उनपर यह आरोप क्यों लगा? ऐसा कौन सा पाप या अपराध उनसे हुआ है कि चोरी का झूठा आरोप लग गया. भगवान इसी सोच में थी कि तभी नारदजी वहां प्रकट हो गए.
अभिवादन के बाद नारदजी ने कहा- प्रभु आप तो अंतर्यामी हैं. आप इस दुविधा में कैसे. आप गणेशजी द्वारा चंद्रमा को दिए शाप के बारे में भूल गए थे और अंजाने में आपने चौथ के चंद्रमा के दर्शन कर लिए. चौथ का चंद्रमा तो कलंकित है. इसलिए यह कलंक तो लगना ही था. कलंक चतुर्थी के चंद्रदर्शन का यह परिणाम है मायापति.
भगवान श्रीकृष्ण ने पूछा- नारद, यह तो आपने बड़ी विचित्र बात कही. ऐसी क्या भूल हो गई थी चंद्रमा से जो उसे गणेशजी ने ऐसा शाप दे दिया. चंद्रमा तो देव हैं. देव के दर्शनमात्र से मनुष्य कलंकित हो जाए यह तो बड़ी हैरान करनी वाल बात हुई? मुझे सारी कथा विस्तार से कहो.
नारदजी ने कथा सुनानी शुरू की. हे केशव एक बार ब्रह्माजी ने गणेशजी को प्रसन्न करने के लिए चतुर्थी का व्रत रखा. गणेशजी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और ब्रह्मदेव से पूछा कि आप किस अभीष्ट की कामना से यह व्रत कर रहे हैं. मैं आपसे प्रसन्न हूं. आप अपना अभीष्ट कहें मैं उसे पूरा करूंगा.
गणेश जी द्वारा वरदान मांगने को कहे जाने पर संतुष्ट ब्रह्माजी ने मांगा- हे गणपति आप लोभ, मोह, मद अहंकार आदि का नाश करने वाले हैं. मुझे अपनी रची सृष्टि का मोह न हो, मुझे यही वर की अभिलाषा है. कृपया यह वरदान प्रदान करें.
गणेशजी ने ब्रह्माजी को उनका इच्छित वर दे दिया और वहां से चले. गणेशजी का शरीर भारी-भरकम है. लंबा पेट है और मुख के स्थान पर हाथी का मस्तक. जबकि चतुर्थी के दिन चंद्रमा सबसे ज्यादा सुंदर रूप में होते हैं. उस दिन वह पूरे शृंगार के साथ प्रकट हुए थे.
गणेशजी कुछ विचारते हुए चले जा रहे थे तभी दैवयोग से कुछ अनहोनी हो गई.
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