पितृपक्ष 2026ः श्राद्ध तर्पण की सरलतम वैदिक विधि (स्टेप-बाय-स्टेप))
श्राद्ध तर्पण, श्राद्ध कर्म, पिंडदान सारी जानकारियां सरल शब्दों में, इसे पढ़ने के बाद इस विषय पर और कुछ पढ़ने की जरूरत न होगी
श्राद्ध तर्पण से पितर तृप्त होते हैं। श्राद्ध कर्म से जिस कुल में पितर तृप्त नहीं, वह कुल कभी सुख-शांति से नहीं रह सकता।
भाद्रपद शुक्लपक्ष की पूर्णिमा से ही श्राद्ध कर्म आरंभ हो जाते हैं। प्रतिपदा तिथि प्रथम श्राद्ध का दिवस है। आज हम आपको श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण और उपयोगी बातें बिंदुवार बताएंगे। याद रहे शास्त्र कहते हैं कि तमाम पूजा-पाठ, व्रत, अनुष्ठान आदि के बाद भी आपके कष्ट नहीं दूर हो रहे तो इसका अर्थ है कि आप पितृदोष से ग्रसित हैं। पितर अप्रसन्न, अतृप्त हैं। जिनके पितर तृप्त नहीं रहते उन्हें पूजा-पाठ का पूर्ण फल नहीं मिलता।

श्राद्ध तर्पण के इस पोस्ट में आप क्या-क्या जानेंगे:
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श्राद्ध तर्पण आदि क्यों जरूरी है?
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श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान में क्या अंतर है?
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पितृपक्ष में पितरों को प्रसन्न रखने का सरल उपाय
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किन मंत्रों से किस प्रकार पिंडदान करना चाहिए?
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पिंड निर्माण और तर्पण की सरल वैदिक विधि
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पंचबलि भोग: श्राद्ध का अनिवार्य अंग (पाँच जीवों का हिस्सा)
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श्राद्ध कर्म की तिथि का निर्धारण कैसे हो? किस दिन किसका श्राद्ध होता है?
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श्राद्ध कर्म 2026 की संपूर्ण प्रामाणिक तिथियां
श्राद्ध कर्म क्यों जरूरी है
भारतीय शास्त्रों में देवकार्य अर्थात पूजा-हवन, व्रत, यज्ञ को जितनी प्रमुखता दी गई है उससे कम महत्ता पितृपूजा को नहीं है. श्राद्ध कर्म परम कल्याणकारी कार्य है. पितरों की संतुष्टि के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करना चाहिए. जो व्यक्ति सिर्फ देवकार्य करते हैं लेकिन श्राद्ध कर्म नहीं करते उनके देवकार्य का वह लाभ नहीं प्राप्त होता जो होना चाहिए था.
सरल भाषा में समझें तो जिस घर में बड़े-बूढ़े भूखे प्यासे हैं उस घर में आकर देवता भोजन कैसे ग्रहण करेंगे? वैसे तो पितरों को प्रतिदिन जल से श्राद्ध करना चाहिए. जो ऐसा नहीं कर पाते उनके लिए पितृपक्ष में श्राद्ध के विशेष दिन बताए गए हैं. जो इन दिनों में भी श्राद्ध कर्म तर्पण आदि नहीं करते, पितृगण उनसे विमुख हो जाते हैं.
श्राद्ध की महत्ता ऐसी है कि माता सीता ने पितरों के लिए पिंडदान और श्राद्ध किया था. सप्तर्षियों में शामिल अगस्तय ऋषि ने एक बार वृक्ष से उलटा लटककर रोते हुए अपने पितरों को देखा. अपने पुण्यकर्मों से उन्हें स्वर्ग प्राप्त हुआ था किंतु फिर भी वे दुखी थे.
अगस्त्य ऋषि विवाह नहीं कर रहे थे. उनके पितरों को आशंका थी कि यदि वंश समाप्त हो गया तो उन्हें श्राद्ध तर्पण नहीं मिलेगा. इससे उन्हें स्वर्ग से निष्कासित होकर इसी तरह दुखी रहना पड़ेगा. पितरों द्वारा श्राद्ध कर्म जैसे पितृकार्य की महत्ता सुनने के बाद महर्षि अगस्त्य को निर्णय बदलना पड़ा था. उन्होंने गृहस्थ धर्म स्वीकार किया और विवाह किया.
माना जाता है कि पितृपक्ष की अवधि में हमारे पितृगण पृथ्वी पर आते हैं. एक पक्ष यानी 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने और संतुष्ट होने के बाद पितर पितृलोक को लौट जाते हैं. इस दौरान पितृ अपने परिजनों के समीप ही स्थित रहकर आनंद का अनुभव करना चाहते हैं. इसलिए पितृपक्ष में कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे पितृगण की मर्यादा खंडित हो और वे नाराज हों.
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श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान में क्या अंतर है?
बहुत से लोग इन तीनों को एक ही मान लेते हैं, किंतु शास्त्रों में इनका स्पष्ट विभाजन है:
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तर्पण: जल में काले तिल, अक्षत, जौ और कच्चा दूध मिलाकर कुश की पवित्री पहनकर अंगूठे के माध्यम से पितरों को जल तृप्त करने की विधि ‘तर्पण’ कहलाती है।
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पिंडदान: पके हुए चावल, जौ के आटे या खोये में तिल और घी मिलाकर गोल पिंड बनाकर पितरों को समर्पित करना ‘पिंडदान’ कहलाता है।
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श्राद्ध: ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्’—श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त अन्न, जल, वस्त्र, ब्राह्मण भोजन और दान-दक्षिणा अर्पित करने की समग्र विधि को ‘श्राद्ध’ कहते हैं।

पितरों को प्रसन्न रखने के लिए विशेष ध्यान देने की बातें
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पितृपक्ष के दौरान यथासंभव ब्राह्मण, जामाता (दामाद), भांजा, मामा, गुरु और नाती को भोजन कराना चाहिए।
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ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए अन्यथा भोजन का अंश नकारात्मक शक्तियां हर लेती हैं। फिर यह भोजन पितृगणों को प्राप्त नहीं होता।
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पितृपक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को पीड़ा न दें।
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भोजन बनाने और परोसने में लोहे के बर्तनों का प्रयोग न करें। मिट्टी, पत्तल, पीतल या चांदी के पात्र उत्तम हैं।
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श्राद्ध के दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। घर में कलह, क्रोध और लहसुन-प्याज, मसूर दाल जैसे तामसिक भोजन से दूर रहें।
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शाम के समय घर के द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके एक दीपक जलाकर रखने का विधान है।
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पंचबलि भोग: श्राद्ध तर्पण का अनिवार्य अंग
ब्राह्मण भोजन कराने से ठीक पहले भोजन की थाली में से 5 विशेष अंश निकाले जाते हैं, जिनके बिना श्राद्ध तर्पण अधूरा माना जाता है:
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गोबलि (गाय): पहला ग्रास गौमाता के लिए।
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श्वानबलि (कुत्ता): दूसरा ग्रास यमराज के दूत कुत्ते के निमित्त।
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काकबलि (कौआ): तीसरा ग्रास कौए के लिए, जो पितृलोक का संदेशवाहक है।
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देवादिबलि (कीट-पतंग/चींटी): चौथा ग्रास चींटियों और सूक्ष्म जीवों के लिए।
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अतिथिबलि (भिक्षुक): पांचवां ग्रास द्वार पर आए किसी भूखे अथवा भिक्षुक के लिए।
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कैसे करें पिंडदान, श्राद्ध कर्म (वैदिक विधि)
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श्राद्ध कर्म तर्पण और पिंडदान में श्वेत (सफेद) वस्त्र ही धारण करें।
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जौ के आटा या खोया से पिंड का निर्माण कर लें।
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फिर चावल, कच्चा सूत, पुष्प, चंदन, फल, अगरबत्ती, धूप, तिल, जौ आदि से कुश के आसन पर रखकर पिंड पूजन कर लें।
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पिंड को हाथ में ले लें फिर इस मंत्र को पढ़ने के बाद पिंड को अंगूठा और तर्जनी के मध्य (पितृतीर्थ) से छोड़ें:
तर्पण मंत्र: “इदं पिण्डं (पितर का नाम व गोत्र लें) तेभ्यः स्वधा।”
(कम से कम तीन पीढ़ी के पितरों—पिता, दादा, परदादा के लिए अलग-अलग पिंड अर्पित करें)
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इसके बाद निम्न मंत्र को तीन बार पढ़कर पितरों की आराधना करनी चाहिए। यह मंत्र स्वयं ब्रह्माजी द्वारा रचा गया है:
पितृ आराधना एवं तर्पण मंत्र:
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः।।
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इसके बाद पिंड को उठाकर बहते जल में प्रवाहित कर दें या पीपल की जड़ में रख दें।
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श्राद्ध सदैव दोपहर के समय (कुतुप काल, 11:30 से 2:30 बजे के बीच) ही करें। प्रातःकाल एवं सायंकाल में श्राद्ध की मनाही है।
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श्राद्ध करते समय दाहिने से बाएं नहीं बल्कि बाएं से दाहिने (घड़ी की सुई की उल्टी दिशा) परिक्रमा करनी चाहिए।
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श्राद्धकर्म सदैव दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूरा करें, क्योंकि दक्षिण ही यम और पितरों की दिशा है।
यह भ्रामक है कि इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जितना भोजन खिलाएंगे वह सारा पदार्थ उसी आकार, वजन और मात्रा में पितरों को मिल जाएगा। वास्तव में श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है जिस योनि में वह प्राणी है। सच्चे मन, विश्वास और श्रद्धा के साथ किए गए श्राद्ध से पितरों को आत्मिक शांति मिलती है और वे वंशवृद्धि व सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
श्राद्ध तर्पण की तिथि का निर्धारण कैसे करें? (किस दिन किसका श्राद्ध तर्पण करना चाहिए?)
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प्रतिपदा से चतुर्दशी: जिस तिथि को परिजन का देहावसान हुआ हो, पक्ष की उसी तिथि को उनका श्राद्ध तर्पण होता है।
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मातृ नवमी (अविधवा नवमी): माता, दादी या कुल की सुहागिन स्त्रियों के श्राद्ध तर्णण के लिए नवमी तिथि आरक्षित है।
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द्वादशी श्राद्ध: संन्यासियों, यतियों और साधु-संतों का श्राद्ध तर्पण द्वादशी को किया जाता है।
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चतुर्दशी श्राद्ध: अकाल मृत्यु, दुर्घटना, विष या शस्त्र से मृत व्यक्तियों का श्राद्ध तर्पण चतुर्दशी को होता है।
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सर्वपितृ अमावस्या: जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध तर्पण छूट गया हो, उन सभी का श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।
पितृ पक्ष 2026 की संपूर्ण श्राद्ध तर्पण तिथियां (कैलेंडर)

आमतौर पर पितृपक्ष 16 दिनों का होता है, जो भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलता है। 2026 में पितृ पक्ष की प्रामाणिक तिथियां इस प्रकार हैं:
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पूर्णिमा का श्राद्ध: 26 सितंबर 2026 (शनिवार)
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प्रतिपदा का श्राद्ध: 27 सितंबर 2026 (रविवार)
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द्वितीया का श्राद्ध: 28 सितंबर 2026 (सोमवार)
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तृतीया का श्राद्ध: 29 सितंबर 2026 (मंगलवार)
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चतुर्थी का श्राद्ध (महाभरणी): 30 सितंबर 2026 (बुधवार)
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पंचमी का श्राद्ध: 01 अक्टूबर 2026 (गुरुवार)
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षष्ठी का श्राद्ध: 02 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
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सप्तमी का श्राद्ध: 03 अक्टूबर 2026 (शनिवार)
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अष्टमी का श्राद्ध: 03 अक्टूबर 2026 (शनिवार)
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नवमी का श्राद्ध (मातृ नवमी): 04 अक्टूबर 2026 (रविवार)
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दशमी का श्राद्ध: 05 अक्टूबर 2026 (सोमवार)
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एकादशी का श्राद्ध: 06 अक्टूबर 2026 (मंगलवार)
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द्वादशी का श्राद्ध (संन्यासी श्राद्ध): 07 अक्टूबर 2026 (बुधवार)
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त्रयोदशी का श्राद्ध (मघा श्राद्ध): 08 अक्टूबर 2026 (गुरुवार)
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चतुर्दशी श्राद्ध (अकाल मृत्यु): 09 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
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सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध: 10 अक्टूबर 2026 (शनिवार)
श्राद्ध तर्पण और पिंडदान से जुड़ीं जानने योग्य महत्वपूर्ण बातें (FAQs)
प्रश्न 1: क्या पुत्र के न होने पर पुत्री, पत्नी या पुत्रवधू श्राद्ध तर्पण कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, गरुड़ पुराण और धर्मसिंधु के अनुसार यदि ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ पुत्र न हो, तो पौत्र, प्रपौत्र, पत्नी अथवा पुत्री भी विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण कर सकती है। रामायण काल में जब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी सामग्री जुटाने गए थे, तब सीता माता ने फाल्गु नदी के तट पर महाराज दशरथ के निमित्त स्वयं पिंडदान किया था। अतः परिवार में पुत्र न होने पर स्त्रियां बिना संकोच के शुद्ध भाव से श्राद्ध तर्पण संपन्न कर सकती हैं।
प्रश्न 2: यदि किसी पूर्वज या परिजन की देहावसान तिथि याद न हो तो श्राद्ध कब करें?
उत्तर: यदि किसी परिजन की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो आश्विन कृष्ण पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या (महालय) के दिन उनका श्राद्ध और तर्पण करना शास्त्रसम्मत माना गया है। इसके अतिरिक्त, यदि पिता की तिथि अज्ञात हो तो अष्टमी अथवा अमावस्या, और माता की तिथि ज्ञात न हो तो ‘मातृ नवमी’ के दिन उनका श्राद्ध किया जा सकता है।
प्रश्न 3: श्राद्ध तर्पण में काले तिल और कुशा (Kusha) का प्रयोग क्यों अनिवार्य है?
उत्तर: शास्त्रों के अनुसार काले तिल और कुशा की उत्पत्ति भगवान श्रीहरि विष्णु के अंश से हुई है। तिल में नकारात्मक शक्तियों, असुरों और अतृप्त आत्माओं से हविष्य की रक्षा करने की शक्ति होती है, जिससे भोजन सीधे आपके पितरों तक पहुँचता है। वहीं अनामिका अंगुली में कुशा की पवित्री पहनने से शरीर का विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है और हाथ से दिया गया तर्पण जल पितृतीर्थ से होकर पितृलोक तक पहुँचता है।
प्रश्न 4: क्या घर में सूतक (जनन अथवा मरण अशौच) लगा हो तो श्राद्ध किया जा सकता है?
उत्तर: परिवार में जन्म अथवा मृत्यु के कारण जब तक सूतक या पातक रहता है, तब तक उस परिवार के सदस्य स्वयं श्राद्ध कर्म, पिंडदान या देवपूजा नहीं कर सकते। ऐसी स्थिति में सूतक समाप्त होने के बाद आने वाली पहली अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) के दिन छूटा हुआ श्राद्ध तर्पण संपन्न किया जाना चाहिए।
प्रश्न 5: क्या घर पर बिना किसी पुरोहित या पंडित के स्वयं श्राद्ध तर्पण किया जा सकता है?
उत्तर: यदि किसी कारणवश पुरोहित उपलब्ध न हों, तो व्यक्ति स्वयं दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल, कच्चा दूध, तिल और जौ हाथ में लेकर पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण कर सकता है। शास्त्रों का स्पष्ट मत है कि यदि कोई व्यक्ति अन्न या पिंड देने में भी असमर्थ हो, तो वह दोनों हाथ उठाकर दक्षिण दिशा में पितरों से प्रार्थना करे और गाय को हरी घास खिला दे; पितृगण उसकी सच्ची श्रद्धा से ही तृप्त हो जाते हैं।
प्रश्न 6: श्राद्ध कर्म के भोजन में किन सब्जियों और अनाजों का प्रयोग वर्जित माना गया है?
उत्तर: श्राद्ध के भोजन में तामसिक और तीक्ष्ण गंध वाले पदार्थों का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है। लहसुन, प्याज, मसूर की दाल, चना, सत्तू, उड़द, हींग, राई, गाजर, बैंगन, शलजम और बासी भोजन पितृकार्य में नहीं बनाना चाहिए। इसके स्थान पर गाय का दूध, घी, दही, खीर, पूड़ी, उड़द के बिना बनी सात्विक कढ़ी और कद्दू (काशीफल) की सब्जी पितरों को अत्यंत प्रिय मानी जाती है।
प्रश्न 7: क्या किराए के मकान में अथवा फ्लैट में श्राद्ध और पिंडदान किया जा सकता है?
उत्तर: बिल्कुल किया जा सकता है। यदि अपना निजी घर न हो, तो किराए के मकान की बालकनी, छत अथवा घर के भीतर दक्षिण दिशा वाले स्वच्छ कोने में कुश का आसन बिछाकर तर्पण किया जा सकता है। इसके अलावा किसी पवित्र नदी के तट, गौशाला अथवा पीपल के वृक्ष की छाया में जाकर भी श्राद्ध कर्म संपन्न करना श्रेष्ठ फलदायी होता है।
प्रश्न 8: अकाल मृत्यु (दुर्घटना, सर्पदंश, जल में डूबने या शस्त्रघात) से मृत परिजनों का श्राद्ध किस दिन होता है?
उत्तर: जिन व्यक्तियों की मृत्यु किसी दुर्घटना, अस्त्र-शस्त्र, विष, सर्पदंश अथवा अस्वाभाविक कारणों से असमय (अकाल मृत्यु) हुई हो, उनका श्राद्ध पितृपक्ष की चतुर्दशी तिथि (घायल चतुर्दशी) को ही किया जाता है। अन्य सामान्य तिथियों पर उनका श्राद्ध नहीं किया जाता।
संकलनः डॉ. धर्मेंद्र कुमार पाठक
(डॉ धर्मेंद्र कुमार पाठक वेदज्ञ हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से वेद दर्शन और कर्मकांड में इन्होंने पीएचडी की शिक्षा प्राप्त की है. संप्रति राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में वेद विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं.)
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